एक तो कोरोना महामारी ऊपर से धैर्यरहित हम भारतीय, मुझे याद नही ये अवगुण हम भारतीयों ने कब से आत्मसाथ कर लिया, क्यूँकि पहले तो हम जगतगुरु कहलाते थे । हमने विश्व को सदमार्ग दिखाया,ज़्यादातर धर्म हमारी ही धरा से अपना प्रवाह लेकर समस्त विश्व को जीवन को जीने की शैली सिखाने के लिए जाने जाते है।
हाँ फिर उपनिवेश काल में ग़ुलाम रहे पर ग़ुलाम अधीर नही हो सकते हाँ उससे पहले सामंतवादी और मुग़लकाल में कुछ जीवनमूल्यों का ह्रास हुआ, पर अब तो लोकतंत्र व गणतंत्र प्रणाली है जिसने हम सब एक समान अधिकार रखते।
फिर ये धैर्यहीनता साथ क्यूँ नही छोड़ रही, आजकल कोरोनाकाल में अस्पताल एक सीमित सुविधाओं से युक्त हैं जो आवश्यकता के अनुरूप अपर्याप्त है, इस महामारी में जब कोरोनाग्रस्त परिजन को किसी अस्पताल में दाख़िला नही मिल पाता तो हम चिकित्सकों से भिड़ जाते, उनके साथ शारीरिक व मौखिक दुर्व्यवहार पर उतर जाते, जो इस कोरोना से ग्रस्त लोगों का ही उपचार कर रहे थे । उन चिकित्सकों का अपराध क्या ? क्या ये कि इस महामारी में वो अपने परिजनों के साथ न रहकर अपने कर्तव्यपथ पर चल रहें, हम ये क्यूँ भूल जाते की वो भी किसी के पुत्र, पुत्री, पिता, पति और भाई हैं उनके भी आप जैसे रिश्ते हैं फिर भी वो मौत और जीवन के बीच खड़े होकर जीवन देने के लिए तत्पर रहते वो भी इतने असहज वस्त्रों और परिवेश में जहां शोक विषाद ,भयानक बीमारी और मौत का भय और उनके भी सकुशल वापसी का उनके बच्चों व परिवार का आपकी तरह ही इंतज़ार रहता है। हाल में मैक्स हॉस्पिटल दिल्ली में एक चिकित्सक ने लोगों को अपने सामने दम तोड़ते देख, असहाय अनुभव कर आत्महत्या कर ली, मानवता की मदद में इतना तनाव इनको भी होता ये कोई मशीन तो हैं नही ।
हमारी धैर्यहीनता का ही परिणाम, राजनीतिज्ञों ने इतना दबाव बना दिया गया कि एक वैक्सीन बनाने वाले संस्थान सिरम इन्स्टिटूट आफ इंडिया के मुखिया आदर पूनावाला को ब्रिटेन जाना पडा और उनको जान पर ख़तरा लगने लगा, भारत सरकार में उनको Y श्रेणी की सुरक्षा भी प्रदान किया पर ये धैर्यहीनता हमारी पूरी व्यवस्था में व्याप्त हो गयी।
कभी कभी हम रेलवे के आरक्षण के लिए पंक्तिबद्ध होते तो टिकट का आरक्षण न मिल पाने पर उन पर हमला तो नही कर देते❓ क्यूँकि हमसबको ज्ञात है की ये एक निश्चित सीमा के बाद रेलगाड़ी में सीट तो जोड़ नही सकते ।वैसे हमको अन्य सुविधाओं व व्यवस्थाओं को समझना चाहिए और धैर्य का दामन नही छोड़ना चाहिए।
चिकित्सकों पर दुर्व्यवहार अत्यंत दुःखद और निंदनीय है और न ही ये हमारी परम्परा का हिस्सा है।
🦚 || बाढ़ - पीड़ा ||
जवाब देंहटाएंनदियो ने बिकराल रूप धर,
देश में त्राहि-त्राहि मचा डाली |
घोर गर्जना कर बादलो ने ,
जल-मग्न पृथ्वी कर डाली ||
कोरोना से ग्रसित देश अब,
प्राकृतिक आपदा झेल रहा |
इंसान बचे,कही बहे जानवर,
बड़ी मुसीबतों से जुझ रहा ||
हुआ भूस्खलन पहाडों का,
सड़क-मार्गसब बंद पडे |
फसलें सब बर्बाद हुईं ,
कृषको के ऑसू निकल पड़े ||
इस जन-धन हानि से प्रभुजी,
कैसे हमें उबारोगे |
दीन-दयाल है नाम तुम्हारा ,
दया कर,भवसागर से तारोगे ||
🌱महिपाल
🌿
अति सुंदर, सत्य और यथार्थ वर्णन
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब महिपाल जी
जवाब देंहटाएंडॉक्टर भगवान का रुप होते है हमें उनकी इस कठिन समय मेँ हमें उनके योगदान की सराहना करनी चहिए न कि उनके साथ अभ्रद व्यवहार
।और रह गयी धैर्य की बात इस महामारी ने लोगों को मानसिक रोगी बना दिया है दिन.प्रति लोगों का मनोबल गिरता जा रहा है पर धैर्य तो रखना ही पडेगा।
हार्दिक आभार विचारों से सहमत होने के लिए डॉ प्रज्ञा जी💐🤔
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जवाब देंहटाएंडॉक्टर भगवान का रुप होते है हमें उनकी इस कठिन समय मेँ हमें उनके योगदान की सराहना करनी चहिए न कि उनके साथ अभ्रद व्यवहार
।और रह गयी धैर्य की बात इस महामारी ने लोगों को मानसिक रोगी बना दिया है दिन.प्रति लोगों का मनोबल गिरता जा रहा है पर धैर्य तो रखना ही पडेगा।